वन अधिकार अधिनियम, 2006

पाठ्यक्रम: जीएस-2 /शासन; जीएस-3/पर्यावरण 

सुर्खियों में क्यों

  • हाल ही में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश के लखीमपुर में वन अधिकार अधिनियम, 2006 के अंतर्गत एक मामले की समीक्षा करते हुए एक महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत को पुनः स्पष्ट किया।

हालिया मामले के प्रमुख बिंदु 

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने जिला स्तरीय समिति (DLC) की आलोचना की, क्योंकि उसने 2021 में वन अधिकार दावों को अस्वीकार करने के लिए वर्ष 2000 के 

 वन मामलों पर उच्चतम न्यायालय का अंतरिम आदेश का आधार लिया था, जबकि वन अधिकार अधिनियम, 2006 ऐसे पुराने प्रतिबंधों को स्पष्ट रूप से अधिभावी करता है।

  • न्यायालय ने कहा कि DLC ने विधिक प्रावधानों का उल्लंघन किया, लेकिन वन अधिकार अधिनियम, 2006 में निर्धारित औपचारिक दंडात्मक प्रक्रिया को लागू नहीं किया। इसके स्थान पर समिति को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया।
  • यह मामला वन अधिकार अधिनियम, 2006 और पुराने वन कानूनों/न्यायिक व्याख्याओं के बीच चल रहे तनाव को उजागर करता है।
  • कार्यान्वयन में अंतर, न्यायिक असंगति तथा पुराने प्रावधानों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण वनवासी समुदायों के अधिकार प्रभावित होते हैं।
  • इसमें विस्थापन से सुरक्षा तथा चराई अधिकार जैसे मुद्दे भी शामिल हैं। 

वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 

  • वन अधिकार अधिनियम, 2006 का उद्देश्य पारंपरिक रूप से वन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी और अन्य वन-आश्रित समुदायों के अधिकारों को मान्यता देना और सुरक्षित करना है।
  • यह अधिनियम व्यक्तिगत और सामुदायिक दोनों प्रकार के वन अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है तथा वन संसाधनों के संरक्षण और आजीविका सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

विशेषताएँ 

व्यक्तिगत एवं सामुदायिक अधिकार:

  • यह अधिनियम वनवासियों को व्यक्तिगत तथा सामुदायिक दोनों प्रकार के अधिकार प्रदान करता है।
  • इसमें वन भूमि पर खेती करने और निवास का अधिकार शामिल है।
  • साथ ही चराई, मछली पकड़ने, जल स्रोतों तक पहुँच तथा लघु वन उपज के उपयोग जैसे सामुदायिक अधिकार भी दिए गए हैं।

विशेष कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) के अधिकार:

  • यह अधिनियम विशेष रूप से अति कमजोर जनजातीय समूहों, घुमंतू एवं पशुपालक समुदायों को मान्यता देता है।
  • इसमें जैव विविधता संरक्षण तथा पारंपरिक ज्ञान से जुड़े बौद्धिक अधिकार भी शामिल हैं।

वन भूमि का आवंटन:

  • यह अधिनियम स्वास्थ्य, शिक्षा और आधारभूत संरचना जैसे आवश्यक विकास कार्यों के लिए वन भूमि के सीमित आवंटन की अनुमति देता है।

ग्राम सभा की भूमिका:

  • यह अधिनियम ग्राम सभा को सशक्त बनाता है और स्थानीय वन शासन में उसकी निर्णायक भूमिका सुनिश्चित करता है।
  • ग्राम सभा को वन संरक्षण और जैव विविधता प्रबंधन में सक्रिय भागीदारी का अधिकार दिया गया है।
  • यह बिना उचित पुनर्वास के बेदखली से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास से संबंधित अन्य कानूनों के साथ समन्वय की आवश्यकता भी निर्धारित करता है।

महत्व

ऐतिहासिक अन्याय का सुधार:

  • यह अधिनियम अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य परंपरागत वन-निवासियों के वन भूमि एवं संसाधनों पर अधिकारों को मान्यता देकर लंबे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने का प्रयास करता है।

आजीविका सुरक्षा:

  • यह अधिनियम वन उपज पर कानूनी अधिकार एवं पहुँच प्रदान करता है, जो भोजन, ईंधन, चारा तथा आय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

विकेन्द्रीकृत शासन:

  • यह ग्राम सभा को वन प्रबंधन, संरक्षण और सुरक्षा में अधिकार देकर स्थानीय स्तर पर सहभागितापूर्ण लोकतंत्र को सुदृढ़ करता है।

संरक्षण के साथ समन्वय:

  • यह अधिनियम स्थानीय समुदायों की पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान प्रणाली को शामिल कर सतत वन प्रबंधन को बढ़ावा देता है।

सामाजिक न्याय:

  • यह कमजोर समूहों के विस्थापन और हाशिए पर जाने से सुरक्षा प्रदान करता है तथा संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और गरिमा के अधिकारों के अनुरूप है।

चुनौतियाँ एवं समस्याएँ

मनमाने दावे अस्वीकार करना:

  • कई मामलों में बिना उचित परीक्षण के बड़े पैमाने पर दावों को अस्वीकार किया गया है, और वास्तविक दावेदारों को भी “अतिक्रमणकारी” के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

न्यायिक टकराव:

  • वर्ष 2019 में भारत के उच्चतम न्यायालय ने प्रारंभ में उन व्यक्तियों के निष्कासन का आदेश दिया था जिनके वन अधिकार दावे अस्वीकार कर दिए गए थे, जिससे लगभग 18 लाख लोगों पर प्रभाव पड़ सकता था।
  • विरोध और जनजातीय मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद इस आदेश पर रोक लगा दी गई और राज्यों को अस्वीकृत दावों की पुनः समीक्षा करने का निर्देश दिया गया।

संस्थागत क्षमता की कमी:

  • जिला स्तरीय समितियाँ और राज्य प्राधिकरण अक्सर पर्याप्त संसाधनों और प्रशिक्षण के अभाव में दावों का निष्पक्ष मूल्यांकन करने में असमर्थ रहते हैं।

संरक्षण बनाम अधिकारों का टकराव:

  • वन्यजीव संरक्षण कानूनों और वन अधिकार अधिनियम के बीच तनाव की स्थिति बनी रहती है, विशेषकर बाघ अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों में।

आँकड़ों की कमी:

  • अस्वीकृत दावों और उनके कारणों से संबंधित विश्वसनीय आँकड़ों का अभाव जवाबदेही को कमजोर करता है।

निष्कर्ष एवं आगे की राह 

  • वन अधिकार अधिनियम, 2006 वन-आश्रित समुदायों को सशक्त बनाता है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कमजोर संस्थागत ढाँचा और विधिक टकराव जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
  • इसके प्रभावी कार्यान्वयन हेतु ग्राम सभाओं को और अधिक सशक्त बनाया जाना चाहिए तथा दावे की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाते हुए प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए। साथ ही, संरक्षण से जुड़े कानूनों को वन अधिकार अधिनियम के अनुरूप स्पष्ट विधिक समन्वय प्रदान किया जाना आवश्यक है।
  • अधिकारियों के क्षमता निर्माण, डिजिटल साधनों के उपयोग तथा समुदाय आधारित संरक्षण को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, जिसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना जैसी योजनाओं से जोड़ा जा सकता है।
  • इसके अतिरिक्त, जागरूकता अभियानों को भी मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि वनवासी अपने अधिकारों को प्रभावी रूप से समझ सकें और उनका संरक्षण कर सकें।

स्रोत :TH

 

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